शनिवार, 3 मई 2014

गाँव की मिट्टी

तुम जो भी महसूसते हो
उसे मैं स्वीकार करती हूँ
तुम्हारे मोती जब टपकाते हैं
पीड़ा को बूंदों की शक्ल,
मैं तुम्हारी व्यथा को
और तुम्हारे जज़्बात को
अपने अंदर समेट लेती हूँ
और बिखेर देती हूँ
एक सौंधी महक
जिसे लेकर एक बार फिर
तुम उड़ जाते हो सुदूर

जब तुम चले जाते हो
बहुत दूर रोटी की फिक्र मे
तब अकेली होकर भी
मैं नहीं रोती कभी
क्या पता हवाएँ
पहुंचा दें  
तुम तक मेरी आंखो की नमी
और फिर मैं कभी न पा सकूँ
तुम्हारे आंसुओं की शक्ल
तुम्हारा कोमल स्पर्श

डरती हूँ इसी एक कारण से
वरना अगर तुम दो भरोसा
तो मैं भी जी भर रो लूँ
तुम्हारे साथ लिपटकर भीगा दूँ
तुम्हें भी मैं अपनी नमी से
और चढ़ा दूँ अपना लेप
तुम्हारे तन-मन पर

हाँ,

लिपटना चाहती है तुमसे
तुम्हारे गाँव की मिट्टी
तो इस बार जब आओ
जरा फुर्सत से आओ

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